डिंडौरी। नर्मदा तट पर आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन का उत्सव उस समय देखने को मिला, जब अजीविका मेला सह जनजातीय उत्पाद मेला का आयोजन भव्य रूप में किया गया। मेले का उद्देश्य स्व सहायता समूहों द्वारा निर्मित स्थानीय उत्पादों को नया बाजार उपलब्ध कराना रहा, जिससे लोकल फॉर वोकल की सोच को मजबूती मिले। मेले में महिला स्व सहायता समूहों के हस्तशिल्प, कृषि आधारित एवं घरेलू उत्पादों को लोगों ने सराहा और जमकर खरीदारी की। कार्यक्रम के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जरूरतमंदों को कंबल वितरण भी किया गया। ठंड के मौसम में यह पहल गरीब और असहाय वर्ग के लिए राहत लेकर आई, जिससे प्रशासन की संवेदनशीलता भी सामने आई।
हालांकि, इस आत्मनिर्भरता और कल्याण के माहौल के बीच एक चिंताजनक तस्वीर भी उभरकर सामने आई। मकर संक्रांति के अवसर पर नर्मदा तट क्षेत्र में 5 से 14 वर्ष की आयु के कुछ बच्चे भीख मांगते हुए दिखाई दिए। जबकि भारतीय संविधान के तहत इस आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है, ऐसे में बच्चों का भीख मांगना कई सवाल खड़े करता है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना कल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा और प्राथमिकता होनी चाहिए। शिक्षा से वंचित ये बच्चे न केवल अपने भविष्य से समझौता कर रहे हैं, बल्कि यह सामाजिक तंत्र और प्रशासनिक निगरानी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। अजीविका मेले ने जहां आत्मनिर्भर भारत की झलक दिखाई, वहीं बच्चों की यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास और कल्याण की योजनाएं समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पूरी तरह पहुंच पा रही हैं या नहीं।
