सोशल मीडिया पर मजाक के तौर पर शुरू हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) अब एक बड़े इंटरनेट ट्रेंड में बदल गई है। महज कुछ दिनों में इस व्यंग्यात्मक राजनीतिक ग्रुप ने इंस्टाग्राम पर 13.8 मिलियन फॉलोअर्स का आंकड़ा पार कर लिया है। इसके साथ ही CJP ने 13.3 मिलियन फॉलोअर्स वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और 8.7 मिलियन फॉलोअर्स वाली भारतीय जनता पार्टी को भी पीछे छोड़ दिया है।
दरअसल, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की शुरुआत एक मजाकिया सोशल मीडिया मूवमेंट के तौर पर हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह Gen Z और इंटरनेट यूजर्स के बीच तेजी से वायरल हो गई। इंस्टाग्राम, X और अलग-अलग मीम पेजों पर युवा खुद को इस काल्पनिक पार्टी का सदस्य बताते हुए मजेदार पोस्ट, मीम्स और रील्स शेयर कर रहे हैं।
इस व्यंग्यात्मक आंदोलन को कई चर्चित चेहरों का समर्थन भी मिला है। अभिनेत्री दीया मिर्जा, फातिमा सना शेख, कोंकणा सेन शर्मा और फिल्ममेकर अनुराग कश्यप जैसे नाम भी इसके फॉलोअर्स में शामिल बताए जा रहे हैं।
बताया जा रहा है कि CJP की शुरुआत आम आदमी पार्टी के पूर्व सोशल मीडिया रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने 16 मई को इंस्टाग्राम और X पर की थी। यह कोई वास्तविक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि एक सटायरिकल यानी व्यंग्यात्मक ऑनलाइन आंदोलन है।
यह ट्रेंड उस समय तेजी से उभरा जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। सुनवाई के दौरान ‘कॉकरोच’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर इंटरनेट पर विवाद हुआ और उसी से प्रेरित होकर यह ऑनलाइन मूवमेंट सामने आया।
इंस्टाग्राम पर राजनीतिक पार्टियों के फॉलोअर्स
कॉकरोच जनता पार्टी – 13.8 मिलियन
कांग्रेस – 13.3 मिलियन
भाजपा – 8.7 मिलियन
आम आदमी पार्टी – 1.9 मिलियन
समाजवादी पार्टी – 870 हजार
तृणमूल कांग्रेस – 537 हजार
जनता दल यूनाइटेड – 416 हजार
CJP का मजाकिया “मेनिफेस्टो” भी सोशल media पर खूब वायरल हो रहा है। इसमें रिटायरमेंट के बाद जजों को राज्यसभा सीट न देने, संसद में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करने, दल-बदल करने वाले नेताओं पर 20 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने और प्रतियोगी परीक्षाओं में री-चेकिंग फीस खत्म करने जैसी मांगें शामिल की गई हैं।
पार्टी ने सदस्यता के लिए भी अनोखे नियम बनाए हैं। इसके मुताबिक सदस्य वही बन सकता है जो “बेरोजगार, आलसी और अत्यधिक ऑनलाइन रहने वाला” हो। पार्टी का नाम और लोगो ‘कॉकरोच’ रखने के पीछे तर्क दिया गया है कि व्यवस्था में फैली “सड़न” के बीच ही ऐसे आंदोलन जन्म लेते हैं।
