मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का यह सच जितना कड़वा है, उतना ही शर्मनाक भी। जिस शिक्षक ने अपना पूरा जीवन बच्चों को पढ़ाने, उनका भविष्य गढ़ने और समाज को दिशा देने में लगा दिया, वही शिक्षक सेवानिवृत्ति के बाद इलाज और दवाइयों के लिए संघर्ष करता दिखाई दे, तो यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि एक असफल व्यवस्था का प्रमाण है।
यह मामला सेवानिवृत्त प्राथमिक शिक्षक बाबू भार्गव कसावट जिला बडवानी का है, जिनकी पीड़ा और पूरी जानकारी शासकीय शिक्षक संगठन, जिला डिंडौरी के अध्यक्ष रामकुमार गर्ग द्वारा सामने लाई गई है। गर्ग के अनुसार, बाबू भार्गव की प्रथम नियुक्ति 12 अगस्त 1998 को शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के रूप में हुई थी। इसके बाद वे 01 अप्रैल 2007 को सहायक अध्यापक बने और लंबे संघर्ष के बाद 01 अप्रैल 2018 को उन्हें प्राथमिक शिक्षक का पद मिला। करीब 26 वर्षों की सेवा के बाद वे 30 जून 2024 को सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के 18 महीने बाद भी उन्हें पेंशन के नाम पर केवल ₹2915 रुपये प्रतिमाह मिल रहे हैं। यह राशि न आज की महंगाई को झेल सकती है, न बीमारी को, और न ही एक सम्मानजनक जीवन को।

हालांकि सेवानिवृत्ति के समय उन्हें एनपीएस से लगभग ₹7 लाख और ग्रेच्युटी के रूप में ₹2 लाख 2 हजार कुल मिलाकर करीब ₹9 लाख रुपये प्राप्त हुए, लेकिन गंभीर बीमारी ने इस पूरी राशि को समाप्त कर दिया। रामकुमार गर्ग ने बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और भविष्य की चिंता ने बाबू भार्गव को हार्ट अटैक की चपेट में डाल दिया। इलाज के लिए उन्हें अपोलो अस्पताल, इंदौर में भर्ती कराया गया, जहां लगभग ₹3 लाख रुपये खर्च हुए। वर्तमान में वे सांस फूलने की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और चिकित्सकों के अनुसार उनके हृदय की कार्यक्षमता मात्र 20 प्रतिशत रह गई है। स्थिति यह है कि उन्हें हर महीने लगभग ₹3000 रुपये की दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जबकि पेंशन इससे भी कम है। ऐसे में उन्हें इलाज और जीवन यापन के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है।

रामकुमार गर्ग का कहना है कि यह मामला किसी एक शिक्षक तक सीमित नहीं है। यह उन हजारों शिक्षकों की हकीकत है, जो वर्षों तक सेवा देने के बावजूद सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक और स्वास्थ्य असुरक्षा के शिकार हो जाते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या एक शिक्षक, जिसने अपना जीवन समाज को दिया, उसे बुढ़ापे में भीख जैसी पेंशन पर छोड़ देना न्यायसंगत है? क्या ₹2915 की पेंशन किसी भी तरह से “सामाजिक सुरक्षा” कहलाने योग्य है?
जनधारा न्यूज़ इस खबर के माध्यम से केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की सच्चाई सामने ला रहा है, जिसमें 26 वर्षों तक सेवा देने वाला शिक्षक सेवानिवृत्ति के बाद ₹2915 की पेंशन और गंभीर बीमारी के साथ संघर्ष करने को मजबूर है। हम मानते हैं कि यह दया का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार का सवाल है। जनधारा न्यूज़ नीति-निर्माताओं से अपेक्षा करता है कि वे इस मामले को गंभीरता से लें और ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करें, जिससे कोई भी शिक्षक बुढ़ापे में इलाज और जीवन के लिए परेशान न हो।
