डिंडौरी । जिला चिकित्सालय एक बार फिर अपनी बदहाली और लापरवाही को लेकर सुर्खियों में है। यहां की अव्यवस्था अब कोई नई बात नहीं रह गई है, बल्कि यह रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुकी है। कभी डॉक्टरों की समय पर अनुपस्थिति, कभी साफ-सफाई की बदहाल स्थिति, तो कभी मरीजों से अमानवीय व्यवहार—लगातार सामने आ रहे मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताज़ा मामला और भी ज्यादा चौंकाने वाला और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाने वाला है। जिला चिकित्सालय के बाह्य रोगी कक्ष (ओपीडी) की दीवार पर मरीजों की “सुविधा” के नाम पर एक सूचना चस्पा की गई है। इसमें लिखा गया है कि यदि संबंधित चिकित्सक समय पर उपलब्ध न हों, तो मरीज दिए गए मोबाइल नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।
दीवार पर अंकित सूचना में लिखा है— मरीजों से निवेदन है कि संबंधित चिकित्सक के समय पर उपलब्ध न होने पर 9424940308 एवं संबंधित चिकित्सक के मोबाइल नंबर पर संपर्क करें। समस्त क्लास-1 अधिकारी कॉल पर रहेंगे। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। जब इस नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की गई, तो वह अमान्य (Invalid Number) निकला। यानी मरीजों को भरोसा देने के लिए दीवार पर जो सूचना लिखी गई है, वह महज़ एक औपचारिकता और दिखावा बनकर रह गई है।

कल्पना कीजिए, जब एक बीमार और परेशान मरीज उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचता है और मदद के लिए उस नंबर पर फोन करता है, लेकिन जवाब में “नंबर अमान्य है” सुनने को मिलता है, तो उस पर क्या गुजरती होगी। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि मरीजों की मजबूरी और पीड़ा के साथ खुला मज़ाक है।
मरीजों की सुविधा के नाम पर जिन मोबाइल नंबरों को दीवारों पर प्रदर्शित किया जा रहा है, अगर वही नंबर काम के नहीं हैं, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करता है। सवाल उठता है कि क्या जिला चिकित्सालय सिर्फ कागज़ों और दीवारों तक ही सीमित रह गया है?
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं रही। गुरुवार को शिशु रोग ओपीडी में भी अव्यवस्था का नज़ारा देखने को मिला। छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए माता-पिता घंटों तक डॉक्टर का इंतजार करते रहे। लंबे समय बाद जब डॉक्टर ओपीडी में पहुंचे, तब तक कई अभिभावक थक-हार चुके थे। मजबूरी में बच्चों के इलाज के लिए माता-पिता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।


डिंडौरी जिले में स्वास्थ्य विभाग की यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अफसोस की बात यह है कि ऐसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं, और जिम्मेदार अधिकारी मानो सब कुछ देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक मरीज इस लापरवाही का दर्द सहते रहेंगे, और कब जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?

