मध्यप्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए करोड़ों रुपए की महत्वाकांक्षी योजनाओं पर कार्य कर रही है, लेकिन डिंडौरी जिले के अमरपुर जनपद पंचायत में इन योजनाओं की वास्तविक तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। जनपद पंचायत अमरपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरदा के पल्ला कछार नाला में लगभग 25 लाख रुपए की लागत से बनाया गया। परकुलेशन टैंक केवल चार महीने में पहली बारिश में फटकर दो हिस्सों में बिखर गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि टैंक की दीवारें इतनी कमजोर थीं कि हल्की बारिश में ही यह टूट गई।
मिली जानकारी के मुताबिक निर्माण के दौरान तय मापदंडों का पालन नहीं किया गया, न तो रोलर मशीन का उपयोग हुआ और न ही मिट्टी को दबाने व सघन करने की प्रक्रिया अपनाई गई, केवल ऊपर-ऊपर मिट्टी भर दी गई जिससे टैंक की नींव कमजोर हो गई। परिणामस्वरूप पहली बारिश में संरचना बह गई और 25 लाख रुपए का टैंक अब मलबे में बदल गया।
वहीं इस मामले में तकनीकी स्वीकृति देने वाले सब इंजीनियर, एसडीओ और जनपद अधिकारी अब सवालों से पल्ला झाड़ते नज़र आ रहे हैं और जवाब देने से परहेज कर रहे है।
मामले की जानकारी मिलने के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रेश परस्ते और भाजपा जिला अध्यक्ष चमरू सिंह ने स्थल का निरीक्षण करने की बात कही और दोषियों के खिलाफ जांच व कड़ी कार्यवाही का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों से सरकार की योजनाओं की साख पर बुरा असर पड़ता है और आमजन का भरोसा टूटता है।
प्रियंका मरावी, जनपद एसडीओ अमरपुर ने कहा कि निर्माण कार्य लगभग पूर्ण हो चुका था और कुछ पिचिंग का काम बाकी था, बारिश के कारण टैंक बह गया है और इसे दोबारा निर्माण कराया जा रहा है।
रुद्रेश परस्ते, जिला पंचायत अध्यक्ष ने कहा कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर लाना जनप्रतिनिधियों और प्रशासन का काम है, अगर निर्माण में लापरवाही हुई है तो जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।
भाजपा जिला अध्यक्ष चमरू सिंह ने कहा कि सरकार गरीबों के लिए हर संभव प्रयासरत है, यदि जिम्मेदार अधिकारियों ने लापरवाही बरती है तो जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।
बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी कई ग्राम पंचायतों में बने टैंक, स्टॉप डैम और नालों में भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण के मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यही है कि जब करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं तो उनकी निगरानी कौन कर रहा है। कहना गलत नहीं होगा कि “जल संरक्षण” के नाम पर “धन संरक्षण” का खेल खेला जा रहा है और अगर प्रशासन समय रहते सख्त कदम नहीं उठाएगा, तो योजनाएं सिर्फ भ्रष्टाचार की कहानियां बनकर रह जाएंगी।





