— कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पी.एल. अंबूलकर ने किसानों को किया सतर्क, समय रहते नियंत्रण की सलाह
डिंडौरी। जिले में इन दिनों धान की फसल में पीलापन आने और पौधों के झुलसने की समस्या सामने आ रही है। खेतों में रस चूसक कीटों का प्रकोप बढ़ने से धान के पौधे कमजोर होकर पीले पड़ रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भूरा एवं सफेद फुदका जैसे चूसक कीट पौधों के निचले हिस्से से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।
किसानों की इस समस्या को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र डिंडौरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पी.एल. अंबूलकर ने किसानों को धान की फसल की नियमित निगरानी करने और कीटों का प्रकोप दिखाई देने पर समय रहते नियंत्रण के उपाय अपनाने की सलाह दी है।
प्रति एकड़ 12 स्प्रे पंप के हिसाब से करें छिड़काव
डॉ. अंबूलकर के अनुसार चूसक कीटों के नियंत्रण के लिए थायमेथोक्सम 25 WG की 80 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL की लगभग 60 मिली मात्रा प्रति एकड़ उपयोग की जा सकती है। किसानों को इन दोनों दवाओं में से किसी एक दवा का ही छिड़काव करने की सलाह दी गई है। यह मात्रा लगभग 12 स्प्रे पंप प्रति एकड़ के हिसाब से बताई गई है।

किसानों को विशेष रूप से सलाह दी गई है कि दोनों दवाओं को एक साथ मिलाकर उपयोग न करें। दवा का छिड़काव कीटों के प्रकोप की स्थिति देखकर और अनुशंसित मात्रा में ही किया जाए। साथ ही दवा के लेबल पर दिए गए सुरक्षा निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
फसल की लगातार निगरानी जरूरी
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से धान के खेतों में लगातार निगरानी रखने की अपील की है। यदि पौधों में अचानक पीलापन, झुलसने के लक्षण या चूसक कीटों की संख्या बढ़ती दिखाई दे तो तत्काल कृषि विशेषज्ञ अथवा कृषि विभाग से सलाह लेकर नियंत्रण उपाय अपनाएं। समय पर कीटों का नियंत्रण नहीं होने पर धान की फसल को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
