— निलंबित प्रआर विवेकानंद विवाद: लोकप्रियता बनाम शासकीय जिम्मेदारी, विभागीय कार्रवाई पर उठी बहस
मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में सोशल मीडिया पर लोकप्रिय पुलिस आरक्षक (प्रआर) विवेकानंद के निलंबन के बाद विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके समर्थकों द्वारा व्यक्त की जा रही प्रतिक्रियाओं के बीच विभागीय कार्रवाई के कारणों और पृष्ठभूमि को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इस संबंध में जारी एक टिप्पणी में नागरिकों और समर्थकों से अपील की गई है कि वे विवेकानंद को शासकीय दायित्वों का नियमानुसार निर्वहन करने के लिए प्रेरित करें।
दरअसल टिप्पणी में कहा गया है कि विवेकानंद शहडोल जिले के यातायात थाना में पदस्थ थे और एक शासकीय कर्मचारी के रूप में उनसे निर्धारित समय पर ड्यूटी पर उपस्थित होकर शासन को सेवाएं देने की अपेक्षा थी। आरोप है कि लंबे समय से वे सोशल मीडिया पर अपनी लोकप्रियता का उपयोग करते हुए निजी तौर पर वीडियो निर्माण और प्रसारण गतिविधियों में संलग्न रहे और इसके लिए निजी व्यक्तियों की सेवाएं भी ली गईं। इन तथ्यों की विभागीय स्तर पर जांच की जा रही है।
बताया गया है कि शासकीय ड्यूटी के समय निजी वीडियो शूटिंग और सोशल मीडिया संबंधी गतिविधियों में व्यस्त रहना शासकीय कार्य की श्रेणी में नहीं आता। यदि कोई कर्मचारी बिना अनुमति अथवा सूचना के ड्यूटी से अनुपस्थित रहकर निजी लाभ के लिए व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न रहता है, तो इसे सेवा नियमों का उल्लंघन और पदीय दायित्वों की उपेक्षा माना जा सकता है।
वहीं टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि यदि विवेकानंद सोशल मीडिया और जनजागरूकता से जुड़े कार्यों में विशेष रुचि रखते हैं, तो उनकी प्रतिभा का उपयोग पुलिस विभाग की मीडिया सेल अथवा सोशल मीडिया सेल में किया जा सकता है। इससे शासन की योजनाओं और जनहितकारी संदेशों को अधिक प्रभावी ढंग से आमजन तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
वक्तव्य में यह भी उल्लेख किया गया कि किसी कर्मचारी की लोकप्रियता उसे शासकीय नियमों से ऊपर नहीं रखती। विभाग के लिए यह गौरव की बात हो सकती है कि उसका कोई कर्मचारी जनता के बीच लोकप्रिय है, लेकिन इसके साथ शासकीय जिम्मेदारियों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है।
अंत में समर्थकों और प्रशंसकों से अपील की गई है कि वे विवेकानंद को नियमों के अनुरूप अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित करें। साथ ही कहा गया है कि बिना शासकीय कार्य किए वेतन प्राप्त करना न तो वैधानिक रूप से उचित है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य।


