Mp Breaking News : 72 हजार करोड़ के कर्ज में डूबी उपार्जन व्यवस्था, मध्यप्रदेश सरकार ने मांगी केन्द्रीकृत योजना की अनुमति…

Rathore Ramshay Mardan
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भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने समर्थन मूल्य पर गेहूँ और धान की खरीदी व्यवस्था में बड़ा बदलाव सुझाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि प्रदेश को विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना के स्थान पर केन्द्रीकृत उपार्जन योजना लागू करने की अनुमति दी जाए। इस संबंध में उन्होंने केन्द्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री प्रहलाद जोशी को पत्र भेजा है।

मुख्यमंत्री ने पत्र में उल्लेख किया है कि प्रदेश में गेहूँ का विकेन्द्रीकृत उपार्जन वर्ष 1999-2000 से और धान का 2007-08 से किया जा रहा है। देश के कुल उपार्जन में मध्यप्रदेश का योगदान गेहूँ में 26 प्रतिशत और धान में 6 प्रतिशत है। डॉ. यादव ने कहा कि किसानों के हित में यह योजना अब तक सफल रही है, परंतु अब राज्य पर वित्तीय दबाव अत्यधिक बढ़ गया है। उपार्जन में लगातार वृद्धि से यह बोझ और बढ़ा है — वर्तमान में प्रदेश में 77.74 लाख मीट्रिक टन गेहूँ तथा 43.49 लाख मीट्रिक टन धान का उपार्जन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने पत्र में लिखा है कि स्कंधों (क्लेम्स) के निराकरण में देरी, वास्तविक लागत की प्रतिपूर्ति न होने और केन्द्र से भुगतान में विलंब के कारण राज्य को भारी वित्तीय हानि उठानी पड़ रही है। उन्होंने बताया कि बैंकों से ली गई उधारी अब ₹72,177 करोड़ तक पहुँच चुकी है, जिससे पुनर्भुगतान में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो रही हैं। डॉ. मोहन यादव ने केन्द्र से अनुरोध किया है कि किसानों और राज्य दोनों के हित में मध्यप्रदेश को केन्द्रीकृत उपार्जन योजना के अंतर्गत शामिल किया जाए, जिससे भुगतान प्रक्रिया सुचारु हो और वित्तीय बोझ में कमी आए।

— कांग्रेस का विरोध — “किसानों के साथ अन्याय

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री के इस निर्णय का विरोध किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि “मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने गेहूँ और धान की सरकारी खरीदी से हाथ खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी को पत्र लिख दिया है कि अब एफसीआई (FCI) खरीदी करेगा। यह फैसला किसानों के लिए नुकसानदायक साबित होगा।”

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पटवारी ने कहा कि “गुणवत्ता मानक के नाम पर लाखों क्विंटल गेहूँ रिजेक्ट होगा और किसान फिर अपनी मेहनत की उपज औने-पौने दामों में निजी व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर होंगे। यह किसानों के आर्थिक शोषण की नीति है, जिसे तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।”

— कृषि नीति पर छिड़ी नई बहस

मुख्यमंत्री का यह प्रस्ताव अब कृषि और उपार्जन व्यवस्था के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ रहा है। एक ओर राज्य सरकार वित्तीय बोझ कम करने की दलील दे रही है, वहीं विपक्ष इसे किसानों के खिलाफ निर्णय बता रहा है। अब यह देखना होगा कि केन्द्र सरकार मध्यप्रदेश के इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेती है।

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