Editorial Story : नकली रौब से नहीं—जिम्मेदारी से बनता है नेता….

Rathore Ramshay Mardan
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(जनधारा)  नेता बनने का आकर्षण सदियों से रहा है। समाज में प्रभाव, पहचान और एक विशेष स्थान—इन सबका मोह हर युग में लोगों को राजनीति की ओर खींचता रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि नेतागिरी का यह मोह कई बार असली जिम्मेदारियों से ज्यादा नकली रौब पर टिक जाता है। हमारी सड़कें, दफ्तर और सार्वजनिक स्थान ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जहाँ लोग खुद को “किसी बड़े का खास” बताकर नियम और कानून को अपनी जेब में रखने की कोशिश करते हैं।

हाल ही की एक घटना इसी मानसिकता का आईना है। हेलमेट न पहनने पर जब पुलिस ने एक व्यक्ति को नियम के अनुसार रोका, तो उसके अंदर की “नेतागिरी” अचानक जाग उठी। खुद को पूर्व मुख्यमंत्री के करीब बताने का दावा, “फर्जी पी.ए.” को फोन लगाना, और पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश—यह सब उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें लोग मानते हैं कि कानून उनके लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए बना है।

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इस बार उनका यह खेल नहीं चला। पुलिस ने न दबाव स्वीकार किया, न धमकी। यह अपने आप में एक मजबूत संदेश है—व्यवस्था को चलाने वाले संस्थानों की वास्तविक ताकत कानून में है, न कि किसी की आवाज़ की ऊँचाई या मोबाइल के कंटैक्ट लिस्ट में।

एक सिपाही की मुस्कान और एक साधारण-सा वाक्य, “अब कहाँ गई नेतागिरी साहब?”, इस पूरे प्रकरण का सार अपने भीतर समेटे हुए है। यह सिर्फ एक तंज नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी है कि नकली प्रभाव, झूठे संबंध और दिखावटी ताकत कभी भी असली जिम्मेदारी और ईमानदारी का स्थान नहीं ले सकती है। सच्चाई यही है कि नेता वो नहीं जो अपने नाम के साथ “खास” जोड़ता फिरता है। नेता वो है जो जनता के लिए खड़ा हो, कानून का सम्मान करे, और अपनी गलतियों को स्वीकार करे।

नेतृत्व की असली पहचान पदवियों में नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाई देती है।यह घटना हमें याद दिलाती है कि समाज को ऐसे नेताओं की जरूरत नहीं जो फोन उठाकर कानून रोक सकें, बल्कि ऐसे नेताओं की जरूरत है जो अपनी गलती मानकर हेलमेट पहनें और दूसरों को भी प्रेरित करें। कानून सबके लिए बराबर है—और यही समानता लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। जिस दिन लोग इसे स्वीकार कर लेंगे, शायद उसी दिन नकली नेतागिरी की दुकानें अपने-आप बंद हो जाएंगी।

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