मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले रक्षाबंधन पर्व के समापन के बाद जिले के बड़ी संख्या में बेरोज़गार युवक-युवतियां रोजगार की तलाश में अपना घर-परिवार छोड़कर दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। हर साल की तरह इस बार भी त्यौहार के बाद युवाओं के प्रवासन की तस्वीर जिले के सामने आ खड़ी हुई है। सरकार की ओर से भले ही रोजगार उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है।
डिंडौरी जिले को बने कई दशक गुजर चुके हैं, लेकिन अब तक यहां औद्योगिक इकाइयों का अभाव है। जिले में न तो बड़े उद्योग स्थापित हुए और न ही व्यापारिक अवसर विकसित हो पाए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिले में उद्योग और व्यवसाय के अवसर पैदा किए जाते तो आज हजारों युवाओं को पलायन नहीं करना पड़ता।
मनरेगा योजना, जो ग्रामीण रोजगार का सबसे बड़ा आधार मानी जाती है, वह भी युवाओं की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है। सीमित कार्य, अनियमित रोजगार और भुगतान में देरी जैसी समस्याओं ने इस योजना की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब स्थानीय स्तर पर मनरेगा का लाभ समय पर नहीं मिलता, तो मजबूरी में उन्हें दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है।
कहना गलत है होगा कि जनप्रतिनिधियों की उदासीनता भी इस समस्या को गहराई दे रही है। जिले में अब तक औद्योगिक विकास की ठोस योजना न बनना और बेरोजगारी को दूर करने की दिशा में ठोस पहल न करना, युवाओं के पलायन का बड़ा कारण बन चुका है।
बता दें कि रोजगार की तलाश में घर छोड़कर जाने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ा खतरा जान का भी है। हाल ही में जिले के दो युवकों की दूसरे राज्यों में काम करने के दौरान दर्दनाक मौत हो गई। यह घटनाएं साफ़ दिखाती हैं कि बेहतर आजीविका की तलाश में घर छोड़ने वाले कई युवक-युवतियां अपनी जान भी गंवा बैठते हैं। सवाल यह है कि आखिर इन मौतों और इनके परिवारों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? बरहाल युवाओं के पलायन से जिले के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर असर पड़ रहा है। परिवारों के बुजुर्ग और महिलाएं गांव में रह जाते हैं, जबकि युवा श्रमिक के रूप में शहरों और दूसरे राज्यों में काम करने निकल जाते हैं। यह स्थिति जिले के भविष्य पर भी सवाल खड़े करती है।



