सावन की चौथी सोमवारी के अवसर पर मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले में आयोजित ऋणमुक्तेश्वर कावड़ यात्रा ने इस बार भी आस्था और जनसहभागिता का नया इतिहास रच दिया। जिले की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक इस कावड़ यात्रा में 15 हज़ार से अधिक श्रद्धालुओं और कावड़ियों ने भाग लिया। यह आयोजन लगातार 15 वर्षों से जारी है, जो अब एक विशाल जन-आंदोलन और धार्मिक परंपरा का रूप ले चुका है।
15 किमी की पदयात्रा बनी भक्ति का प्रतीक
यात्रा की शुरुआत डिंडौरी शहर के मढ़िया घाट से हुई, जहां श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा से जल भरकर कावड़ में रखा और लगभग 15 किमी की पदयात्रा करते हुए कुकर्रामठ स्थित ऋणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे। यात्रा मार्ग में भक्ति और उत्साह की लहर साफ देखी गई।

हर आयु वर्ग का उत्साहपूर्ण सहभाग
इस कावड़ यात्रा में बच्चों से लेकर वृद्धों तक ने भाग लिया। श्रद्धालु कहीं अकेले, तो कहीं समूह में कंधे से कंधा मिलाकर पदयात्रा करते नजर आए। जल कलश को आदरपूर्वक उठाकर भक्तों ने अनुशासन व आस्था का परिचय दिया।
पुष्पवर्षा, फलाहार व स्वागत से गूंजा यात्रा मार्ग
घानाघाट, महावीरा, बल्लारपुर जैसे स्थानों पर स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों एवं ग्रामवासियों ने जगह-जगह स्वागत शिविर लगाए। श्रद्धालुओं को चाय-पानी, फलाहार और पुष्पवर्षा से सम्मानित किया गया।
मंदिर परिसर में दिनभर उमड़ा जनसैलाब
सुबह 7 बजे से ही कुकर्रामठ मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। विशेष व्यवस्था के तहत कावड़ियों को प्राथमिकता से दर्शन कराया गया। मंदिर समिति एवं पुलिस प्रशासन की सतर्कता के चलते कहीं कोई अव्यवस्था नहीं हुई।
सुरक्षा में रही प्रशासन की सतर्कता
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए डिंडौरी से कुकर्रामठ तक सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। पुलिस बल ने यात्रा मार्ग व मंदिर परिसर में भीड़ नियंत्रण को सफलतापूर्वक निभाया।
अनुशासन और श्रद्धा की मिसाल
पूरी यात्रा में श्रद्धालुओं ने अनुशासन, शांति और संयम का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। कहीं भी ध्वनि प्रदूषण या अव्यवस्था की स्थिति नहीं बनी। आयोजन में सामाजिक समरसता का सुंदर चित्र सामने आया।
ऋणमुक्तेश्वर मंदिर बना आस्था का केंद्र
ऐसी मान्यता है कि ऋणमुक्तेश्वर महादेव का जलाभिषेक करने से व्यक्ति को जीवन के कष्टों, ऋणों और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि सावन के हर सोमवार यहां हजारों श्रद्धालु उमड़ते हैं।
संघर्ष से शुरु हुई परंपरा, आज बनी जनआस्था का प्रतीक
समिति के सदस्यों ने बताया कि 15 वर्ष पूर्व जब यात्रा की शुरुआत हुई थी, तब इस परंपरा का विरोध हुआ था। पुरा तत्व विभाग द्वारा पूजन-अर्चन पर आपत्ति जताई गई थी, यहां तक कि एफआईआर की भी कोशिश हुई। बावजूद इसके, समिति ने श्रद्धालुओं के साथ लगातार भक्ति पथ पर यात्रा को आगे बढ़ाया, और आज यह आयोजन डिंडौरी जिले ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों में भी श्रद्धा का केंद्र बन चुका है।
