— करोड़ों साल पुराने इतिहास की अनमोल धरोहर है घुघवा फॉसिल्स पार्क

डिंडौरी। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के शहपुरा विकासखंड में स्थित घुघवा फॉसिल्स पार्क आज भी करोड़ों वर्ष पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। प्रकृति, विज्ञान और इतिहास का अनोखा संगम माना जाने वाला यह पार्क देश-दुनिया के पर्यटकों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहाँ मौजूद पत्थरों में बदल चुके पेड़ धरती के प्राचीन इतिहास की गवाही देते नजर आते हैं।

दरअसल घुघवा फॉसिल्स पार्क में संरक्षित जीवाश्म लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पुराने बताए जाते हैं। इन जीवाश्मों की खोज वर्ष 1970 के आसपास हुई थी, जब स्थानीय ग्रामीणों ने खेतों और जंगलों में कुछ ऐसे पत्थर देखे जिनकी बनावट सामान्य पत्थरों से अलग थी। इन पत्थरों में पेड़ों की छाल, तनों की संरचना और वृक्षों के वलय स्पष्ट दिखाई देते थे। बाद में वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि ये वास्तव में प्राचीन वृक्षों के जीवाश्म हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह क्षेत्र कभी घने जंगलों से आच्छादित रहा होगा, जहाँ ताड़, सागौन समेत अनेक प्राचीन वनस्पतियाँ पाई जाती थीं। माना जाता है कि किसी प्राकृतिक आपदा, संभवतः ज्वालामुखीय गतिविधि या भीषण बाढ़ के कारण ये विशाल वृक्ष मिट्टी में दब गए। लाखों वर्षों तक प्राकृतिक प्रक्रियाओं के चलते इनके जैविक तत्व खनिजों में बदल गए और धीरे-धीरे ये पेड़ पत्थरों का रूप ले बैठे, लेकिन उनकी मूल संरचना आज भी सुरक्षित बनी हुई है।

जीवाश्मों के महत्व को देखते हुए 5 मई 1983 को लगभग 23 एकड़ क्षेत्र में घुघवा फॉसिल्स पार्क की स्थापना की गई। यह पार्क केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र भी माना जाता है। यहाँ पाए जाने वाले जीवाश्म उस समय की जलवायु, भूगोल और वनस्पतियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

पार्क में आज भी वृक्षों के तने, पत्तियाँ, बीज, शंख, नारियल, बीज वाला केला, ताड़ के बीज, खजूर, बादाम और जामुन जैसे अनेक जीवाश्म सुरक्षित अवस्था में देखे जा सकते हैं। घने जंगलों और शांत वातावरण के बीच स्थित यह पार्क पर्यटकों को रोमांच और रहस्य से भर देता है। पत्थरों में बदल चुके इन पेड़ों को देखकर ऐसा महसूस होता है मानो धरती का करोड़ों साल पुराना इतिहास आज भी जीवित हो।

