Dindori Panchayat Corruption : मशीनों से बन रही सड़कें, मजदूर हो रहे बेरोजगार —बिना मजदूरों ₹13.63 लाख का निर्माण, मजदूरी की राशि सप्लायरों के खातों में ट्रांसफर…

Rathore Ramshay Mardan
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डिंडौरी। ग्राम पंचायतों को दी जाने वाली 5वें और 15वें वित्त आयोग की राशि गांव के विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए होती है, लेकिन कई पंचायतों में इसका दुरुपयोग खुलकर सामने आ रहा है। पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर मशीनों से काम कराकर ग्रामीणों को पलायन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

बता दें कि सीसी सड़क जैसे निर्माण कार्यों में मस्टर रोल जारी करने और मजदूरों को भुगतान करने की जो तय प्रक्रिया है, उसका पालन कई जगह नहीं हो रहा। मस्टर रोल, जो मजदूरी का प्रमाण होता है, केवल कागज़ों में भरा जाता है, जबकि ज़मीनी स्तर पर काम मशीनों से कराया जा रहा है। नियम स्पष्ट हैं कि मजदूरी का भुगतान सीधे मज़दूरों के बैंक खातों में किया जाना चाहिए, लेकिन अधिकांश पंचायतों में मजदूरी राशि पंचायत प्रतिनिधियों या सप्लायरों के खातों में ट्रांसफर की जा रही है।

दरअसल ताज़ा मामला जनपद पंचायत शहपुरा के अंतर्गत ग्राम पंचायत छपरा रैयत का है, जहां बिना मजदूरों के सीसी सड़क समेत अन्य निर्माण कराया गया और मजदूरी की पूरी राशि सप्लायरों के खातों में ट्रांसफर कर दी गई मजे की बात यह है संदाय प्रमाणक ग्राम पंचायत बड़झर के बिल फीड कर भुगतान कर दिया गया ऐसे तमाम भुगतना किया जो तय नियमों को ठेंगा दिखा रहे है। यह मामला पंचायत व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मिली जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में ग्राम पंचायत छपरा से 5वें वित्त राज्य मद से ₹6 लाख 36 हजार और 15वें वित्त केंद्रीय सहायता राशि से ₹1 लाख 23 हजार स्टॉप डैम मरम्मत के लिए स्वीकृत हुई थी। इसके अलावा, दो सीसी सड़कों के निर्माण हेतु ₹1 लाख 83 हजार और ₹4 लाख 21 हजार की राशि भी स्वीकृत की गई थी।

ग्राम पंचायत द्वारा बजरंग टेकरी से बस्ती तक सीसी सड़क का निर्माण कार्य कराए जाने की जानकारी दी गई, लेकिन पूरा कार्य मशीनों से कराया गया। एक भी स्थानीय मजदूर नहीं लगाया गया। इसके बावजूद, मस्टर रोल में मजदूरों के नाम दर्ज कर भुगतान दर्शाया गया और पूरा भुगतान सप्लायर के खातों में ट्रांसफर कर दिया गया। मजे की बात यह है कि भुगतान सादे कागज़ों पर बने बिलों के आधार पर किया गया, जिनमें न तो जीएसटी नंबर है, न ही सामग्री विवरण, न दरें दर्ज है।

आरोप है कि सरपंच देव सिंह कुशराम, सचिव जगदीश मरावी और रोजगार सहायक ने आपसी मिलीभगत से मजदूरी व मटेरियल मद की राशि अपने चहेते सप्लायरों के खातों में ट्रांसफर की। जबकि नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मजदूरी का भुगतान सीधे मजदूरों के बैंक खातों में किया जाना चाहिए। मनरेगा अधिनियम 2005 की धारा 3(3) और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार मजदूरी या निर्माण मद की राशि किसी भी हालत में पंचायत प्रतिनिधि ,सचिव या सप्लायर के निजी नियंत्रण में नहीं रह सकती। ऐसा करना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

बता दें कि पंचायतों में मशीनों से काम कराए जाने से मजदूरों को रोजगार नहीं मिल पा रहा। यही कारण है कि ग्रामीणों को मजबूर होकर दूसरे प्रदेशों में पलायन करना पड़ रहा है। जनपद पंचायत शहपुरा की ग्राम पंचायत छपरा इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां ₹13.63 लाख की लागत से हुए निर्माण में एक भी मजदूर नहीं लगाया गया। गौरतलब है कि छपरा पंचायत में इससे पहले भी विकास कार्यों में अनियमितता की शिकायतें उठी हैं, लेकिन उच्च अधिकारियों द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। परिणामस्वरूप सरपंच-सचिव और रोजगार सहायक के हौसले और बुलंद हैं और नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।

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