(जनधारा न्यूज डेस्क) भोपाल स्थित शासकीय श्रमोदय आवासीय विद्यालय (मुगालिया छाप) में मेस संचालन के नाम पर करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितता का बड़ा मामला सामने आया है। जांच के बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने 1.55 करोड़ रुपये की हेराफेरी के मामले में सात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।
— ये रहा पूरा मामला
दरअसल पूरा मामला मजदूरों के बच्चों के लिए संचालित श्रमोदय विद्यालयों में मेस संचालन से जुड़ा है। वर्ष 2021 में मध्य प्रदेश भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल द्वारा प्रदेश के चार श्रमोदय विद्यालयों में मेस संचालन के लिए टेंडर जारी किया गया था, जिसमें भोपाल और इंदौर के विद्यालयों का ठेका “कनका फूड मैनेजमेंट सर्विसेस प्रा. लि.” को दिया गया था। इस कंपनी द्वारा विद्यार्थियों को भोजन उपलब्ध कराया जा रहा था और भुगतान कंपनी के अधिकृत बैंक खाते में किया जाता था।
जांच में सामने आया कि वर्ष 2023 में कंपनी में सुपरवाइजर के रूप में कार्यरत गौरव शर्मा ने साजिश रचते हुए असली कंपनी के नाम से “प्राइवेट लिमिटेड” शब्द हटाकर मिलते-जुलते नाम की एक फर्जी फर्म तैयार करवाई। यह फर्जी फर्म उसके परिचित हर्ष मरजानी के नाम से बनाई गई और इसका बैंक खाता इंदौर स्थित ए.यू. स्मॉल फाइनेंस बैंक में खोला गया।
इसके बाद फर्जीवाड़े को आगे बढ़ाने के लिए 27 जून 2024 को एक फर्जी लेटरहेड तैयार कर स्कूल प्रशासन को बैंक खाता बदलने का पत्र सौंपा गया। इस पत्र के आधार पर भविष्य के भुगतान फर्जी बैंक खाते में ट्रांसफर कराए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
जांच में यह भी पाया गया कि विद्यालय की तत्कालीन लेखापाल लीना विश्वकर्मा ने बैंक खाता बदलने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय के लिए सक्षम वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति नहीं ली। आरोप है कि उन्होंने नोटशीट पर असली कंपनी का नाम लिखकर भुगतान की प्रक्रिया तो सही दिखाई, लेकिन चेक जारी करते समय जानबूझकर “प्रा. लि.” शब्द हटा दिया, जिससे भुगतान फर्जी फर्म के खाते में चला गया।
इस पूरे प्रकरण में तीन तत्कालीन प्राचार्यों विजय सिंह महोबिया, संतोष सिंह सिसोदिया और वीरेन्द्र दुबे पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। जांच में पाया गया कि इन अधिकारियों ने फर्जी चेकों पर हस्ताक्षर कर भुगतान को मंजूरी दी, जबकि उन्हें कंपनी और बैंक खाते के बदलाव पर संदेह करना चाहिए था।
जांच रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे फर्जीवाड़े में कुल 1,55,49,498 रुपये की राशि असली कंपनी के बजाय फर्जी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी गई। खास बात यह भी सामने आई कि बैंक खाता बदलने का पत्र 2024 में दिया गया, जबकि फर्जी खाते में पहला भुगतान 2023 में ही कर दिया गया था, जो पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वर्ष 2025 में नए प्राचार्य प्रदीप राजावत के कार्यभार संभालने के बाद इस पूरे मामले का खुलासा हुआ। उन्होंने दस्तावेजों की जांच के दौरान अनियमितताओं को पकड़ा और असली कंपनी को भुगतान सुनिश्चित कराया। इसके बाद मामला उच्च स्तर पर पहुंचा और जांच एजेंसियों को जानकारी दी गई।
दस्तावेजों, चेक बुक, कैशबुक और बैंक रिकॉर्ड की गहन जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह पूरा प्रकरण सुनियोजित तरीके से किया गया फर्जीवाड़ा था, जिसमें सरकारी धन को फर्जी कंपनी के खाते में ट्रांसफर कर गबन किया गया। जांच के आधार पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने सभी सात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 61(2), 318(4), 338, 336(3), 340(2) सहित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज कर लिया है और आगे की वैधानिक कार्रवाई जारी है।
