मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले में किसानों की लाचारी और भोलेपन का फायदा उठाकर बैंक प्रबंधन और दलालों ने ऐसी साजिश रची जिसने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया है। करंजिया विकासखंड के गोरखपुर सेंट्रल बैंक से जुड़े फर्जी ऋण घोटाले में अब ऐसे-ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिन्हें सुनकर हर कोई हैरान और गुस्से से भर उठता है।
ग्राम पंचायत चंदना का समलिया धुर्वे, जो जन्म से ही गूंगा था और आठ साल पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह चुका है, उसके नाम पर भी बैंक ने कर्ज चढ़ा दिया। कागजों में उसे ₹2,21,235 का ऋणदार बना दिया गया, जबकि हकीकत यह है कि इस मासूम की न तो आवाज थी, न हाथों में कलम और न ही बैंक जाने की ताकत। लेकिन दलालों की भूखी आंखों ने उसके मरने के बाद भी चैन से सोने नहीं दिया और उसके नाम पर लोन पास कर पैसे हड़प लिए। यह सुनते ही गांव के लोगों की आंखों में आंसू आ गए और दिलों में गुस्सा भर गया कि इंसानियत इतनी गिर कैसे सकती है।
इतना ही नहीं, माधोपुर के बद्री सिंह, जिनके पास एक टुकड़ा जमीन तक नहीं है, उनके नाम पर भी लोन निकाल लिया गया। बद्री बताते हैं कि उन्हें कभी बैंक जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि जमीन ही नहीं तो लोन का सवाल ही कहां उठता है। लेकिन जब डाक से नोटिस आया तो पैरों तले जमीन खिसक गई। शनिवार को वे बैंक पहुंचे तो वहां से भी कोई ठोस जवाब नहीं मिला। बद्री की व्यथा सुनकर ग्रामीण भौंचक रह गए—जिसके पास खेत तक नहीं, उसे कैसे कर्जदार बना दिया गया?
ग्रामीणों का कहना है कि यह किसी साधारण लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है। सामान्य किसानों को कर्ज लेने के लिए महीनों चक्कर लगाना पड़ता है, अधिकारी गांव जाकर जमीन की नाप-तौल करते हैं, दस्तावेज खंगालते हैं, फिर भी लोन मुश्किल से मिलता है। लेकिन यहां तो बिना जांचे-परखे लाखों रुपये का लोन पास कर दिया गया। आखिर किसके इशारे पर यह सब हुआ?
सबसे बड़ा खुलासा ऋण पुस्तिकाओं से हुआ है। छोटे किसानों की जमीनों का रकबा कागजों में बढ़ाकर लिखा गया। दो हेक्टेयर वाले किसान को चार हेक्टेयर का मालिक बना दिया गया। कहीं व्हाइटनर लगाया गया, कहीं ओवरराइटिंग की गई और इन नकली आंकड़ों के सहारे लाखों रुपये का कर्ज दिखा दिया गया। किसानों का कहना है कि उनके पास उतनी जमीन है ही नहीं जितनी बैंक रिकॉर्ड में दर्ज है। यह सुनकर ग्रामीण दंग रह गए कि उनकी मेहनत की पसीने से सिंचाई करने वाली जमीन को भी लूट का जरिया बना दिया गया।
यह घोटाला सिर्फ किसानों की जेब पर डाका नहीं है, बल्कि इंसानियत के माथे पर कलंक है। दिव्यांग और भूमिहीन तक को कर्जदार बनाना इस बात का सबूत है कि जब सत्ता और लालच मिल जाए तो किसी गरीब की इज्जत, जमीन और जिंदगी कुछ भी मायने नहीं रखती। अब ग्रामीणों की एक ही मांग है—इस फर्जीवाड़े की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषियों को कड़ी सजा मिले।



