— न्यायालय आदेश की अनदेखी कर फर्जी डीएड धारकों की बहाली, एरियर में लाखों का भुगतान
— दस्तावेज सत्यापन के नाम पर खेल, आरटीआई में खुली पोल
डिंडौरी। जिले में फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी और पदोन्नति पाने का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद फर्जी डीएड डिप्लोमा धारक शिक्षकों को न केवल बहाल किया गया, बल्कि उन्हें वेतन और एरियर के रूप में लाखों रुपए का भुगतान भी कर दिया गया।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2019 में समनापुर थाना क्षेत्र में फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी करने वाले शिक्षकों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया था। न्यायालय प्रथम अपर सत्र न्यायालय डिंडौरी ने 19 सितंबर 2024 को अपने निर्णय में दो आरोपियों को सजा सुनाई, जबकि संतु सिंह मरकाम और आरती मोंगरे को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त करते हुए उनके दस्तावेजों की विभागीय जांच के निर्देश दिए थे।
न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि आपराधिक मामले में दोषमुक्ति के बाद भी विभागीय कार्रवाई की जा सकती है और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य है। इसके बावजूद तत्कालीन सहायक आयुक्त द्वारा 28 अक्टूबर 2024 को दोनों शिक्षकों को बहाल कर दिया गया। आरती मोंगरे को प्राथमिक विद्यालय हल्दी करेली और संतु सिंह मरकाम को प्राथमिक शाला चपवार में पदस्थ किया गया।
मामले में कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं। जांच के दौरान संतु सिंह मरकाम की अंकसूची से संबंधित दस्तावेज कूटरचना करने वाले आरोपी के कंप्यूटर से बरामद हुए, जिसकी पुष्टि एफएसएल रिपोर्ट में भी हुई। वहीं आरती मोंगरे की प्रस्तुत अंकसूची में वर्ष 2009 का उल्लेख है, जबकि उसमें हस्ताक्षर करने वाली प्राचार्य वर्ष 1998 तक ही पदस्थ रही थीं, जिससे दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
दस्तावेज सत्यापन को लेकर भी बड़ा खुलासा हुआ है। बीईओ कार्यालय द्वारा माध्यमिक शिक्षा मंडल को पत्र भेजे जाने का दावा किया गया, लेकिन सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जवाब में यह स्पष्ट हुआ कि ऐसा कोई पत्र कभी भेजा ही नहीं गया। इससे जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा डाइट मंडला और डाइट जबलपुर से प्राप्त जानकारी में भी संबंधित शिक्षकों के नाम से कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं पाया गया, जिससे फर्जी डिग्री का मामला और मजबूत हो गया है।
हालांकि मामला कलेक्टर स्तर तक पहुंचा और जांच के आदेश भी दिए गए, लेकिन जांच में ठोस कार्रवाई के बजाय केवल औपचारिकता निभाई गई। न तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई और न ही शासन को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई की गई। पूरे प्रकरण ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी करने वालों को संरक्षण मिलने और जांच प्रक्रिया में लापरवाही से यह स्पष्ट होता है कि सिस्टम की मिलीभगत से शासन को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है। अब देखना होगा कि इस मामले में उच्च स्तर पर क्या कार्रवाई होती है।

