— 4,650 किसानों का जैविक प्रमाणीकरण, कम लागत वाली खेती और जल संरक्षण पर जोर
डिंडौरी। जिले में प्राकृतिक खेती एवं एकीकृत कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न विभागों के समन्वय से प्रयास किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य किसानों की रासायनिक कृषि निवेशों पर निर्भरता कम करना, मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाना, जल संरक्षण को प्रोत्साहित करना और खेती को टिकाऊ एवं जलवायु-अनुकूल बनाना है। इस पहल के तहत बीते एक वर्ष में प्राकृतिक एवं सतत कृषि पद्धतियों के विस्तार के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले में विगत एक वर्ष के दौरान 873 नए परिवारों को प्राकृतिक एवं सतत कृषि पद्धतियों से जोड़ा गया है, जबकि 12,258 नए किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने की पहल की गई है। किसानों को आवश्यक संसाधन और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 33 नए जैव संसाधन केंद्र (बीआरसी) भी स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों के माध्यम से प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने तथा किसानों को आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।
प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के साथ जिले में 4,650 किसानों का जैविक प्रमाणीकरण भी कराया गया है। इसके अलावा कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इनमें रामतिल, मसूर और सरसों जैसी फसलें शामिल हैं। इन फसलों को बढ़ावा देने का उद्देश्य जल संरक्षण के साथ कृषि में फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना है।
प्राकृतिक खेती के विस्तार से मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने, कृषि लागत कम करने और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों के जरिए किसानों को इन पद्धतियों के प्रति जागरूक कर उन्हें अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
जिले में प्राकृतिक खेती और एकीकृत कृषि प्रणाली को प्रोत्साहन देने की यह पहल कृषि की दीर्घकालीन स्थिरता के साथ किसानों की आय और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, इन प्रयासों के वास्तविक परिणाम किसानों की भागीदारी, संसाधनों की उपलब्धता और खेती में इन पद्धतियों के निरंतर उपयोग पर निर्भर करेंगे।

