— 374 नगरीय निकायों में 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी का विश्लेषण, एक जैसी LED लाइट की कीमत में भारी अंतर; AI से हो रही निगरानी
भोपाल। मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में सामग्री खरीदी और निर्माण कार्यों से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं को लेकर राज्य सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग की जांच में सामने आए मामलों में अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की गई है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 62 प्रकरणों में 146 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में आए हैं। इनमें सात कर्मचारियों की सेवा समाप्त की गई, 76 की वेतनवृद्धि रोकी गई और 38 प्रकरणों में वित्तीय नुकसान की वसूली के आदेश जारी किए गए हैं। कुछ मामलों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन संबंधी लाभों में कटौती का निर्णय भी लिया गया है।
नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने स्पष्ट किया है कि सरकारी खरीदी में होने वाले खर्च की निगरानी की जा रही है। विभाग का जोर इस बात पर है कि सरकारी धन का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार हो और अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
1,134 करोड़ रुपये की खरीदी का विश्लेषण
विभागीय विश्लेषण में प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा पिछले तीन वर्षों में गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से की गई लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी की समीक्षा की गई। इस दौरान एक जैसी सामग्री की खरीदी में अलग-अलग निकायों द्वारा चुकाई गई कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि यदि खरीदी औसत बाजार दरों के अनुरूप की जाती, तो लगभग 200 से 250 करोड़ रुपये तक की संभावित बचत हो सकती थी। यह संभावित बचत का अनुमान है, प्रमाणित वित्तीय नुकसान या वसूली की राशि नहीं।
LED लाइट से लेकर फिनाइल तक, कीमतों में भारी अंतर
खरीदी के आंकड़ों में सामने आए मूल्य अंतर ने सरकारी खरीद प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, एक नगरीय निकाय ने 60 वॉट की LED लाइट लगभग 306 रुपये में खरीदी, जबकि भोपाल में इसी तरह की लाइट की कीमत 11,800 रुपये दर्ज की गई।
इसी तरह, फिनाइल की खरीदी में भी बड़ा अंतर सामने आया। एक निकाय में इसकी कीमत लगभग पांच रुपये प्रति लीटर बताई गई, जबकि दूसरे मामले में 33,500 रुपये की कीमत दर्ज होने की जानकारी सामने आई। हालांकि, ऐसे मामलों में उत्पाद की विशिष्टता, मात्रा, पैकेजिंग और आपूर्ति की शर्तों का सत्यापन भी जरूरी है, ताकि वास्तविक मूल्य तुलना की जा सके।
कचरा वाहनों की खरीदी में भी अंतर सामने आया। एक निकाय ने वाहन लगभग दो लाख रुपये में खरीदा, जबकि दूसरे निकाय में चार अतिरिक्त डस्टबिन सहित इसी तरह के वाहन की कीमत छह लाख रुपये बताई गई। इन उदाहरणों के आधार पर विभाग ने खरीदी प्रक्रिया और भुगतान की निगरानी तेज की है।
AI से होगी खरीदी की निगरानी
सरकारी खरीदी में गड़बड़ियों की पहचान के लिए तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित विश्लेषण का उपयोग किया जा रहा है। इसका उद्देश्य अलग-अलग नामों से दर्ज की गई समान वस्तुओं की पहचान करना और विभिन्न नगरीय निकायों में उनकी खरीदी दरों की तुलना करना है।
इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी वस्तु को एक निकाय ने किस दर पर खरीदा और दूसरे निकाय ने उसी तरह की वस्तु के लिए कितना भुगतान किया। संदिग्ध अंतर मिलने पर संबंधित प्रकरण की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका निर्धारित की जा सकती है।
ठेकेदारों और सप्लायर्स पर भी कार्रवाई
विभागीय कार्रवाई केवल अधिकारियों और कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। निर्माण कार्यों में देरी, काम शुरू नहीं करने, नियमों के उल्लंघन और गलत जानकारी देने जैसे मामलों में ठेकेदार फर्मों के विरुद्ध भी कार्रवाई की गई है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 80 ठेकेदार फर्मों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की जानकारी सामने आई है। इन पर अलग-अलग अवधि के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं।
सरकारी धन के उपयोग में जवाबदेही पर जोर
सरकार की इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य नगरीय निकायों में खरीदी और निर्माण कार्यों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना, सरकारी राशि के दुरुपयोग पर रोक लगाना और नागरिकों को विकास कार्यों का वास्तविक लाभ पहुंचाना है।
विभाग का रुख स्पष्ट है कि जहां वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होगी, वहां संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, प्रत्येक मामले में आरोप, जांच के निष्कर्ष और अंतिम दंडात्मक आदेश को अलग-अलग समझना जरूरी है।
