— “जल गंगा अभियान” में देश में दूसरा स्थान पाने वाला डिंडौरी, फिर क्यों पानी के लिए सड़क पर उतर रहे लोग
डिंडौरी। एक ओर जिला प्रशासन “जल गंगा संवर्धन अभियान” में डिंडौरी को राष्ट्रीय स्तर पर मिली उपलब्धि का ढोल पीट रहा है, वहीं दूसरी ओर जिले के कई गांवों में लोग पीने के पानी के लिए सड़क और हाईवे जाम करने को मजबूर हैं। यही विरोधाभास अब लोगों के बीच बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार डिंडौरी जिला “जल गंगा संवर्धन अभियान” और “जन भागीदारी अभियान” के तहत देशभर में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। दावा किया जा रहा है कि जिले में 5 लाख 82 हजार से अधिक जल संरचनाओं का निर्माण किया गया है। इनमें कंटूर ट्रेंच, रिचार्ज पिट, खेत तालाब, चेक डैम, बोरी बंधान, रूफटॉप वॉटर हार्वेस्टिंग और हैंडपंप रिचार्ज जैसे कार्य शामिल हैं।
शासन का कहना है कि इन योजनाओं का उद्देश्य वर्षा जल को सहेजना और भविष्य के जल संकट का स्थायी समाधान तैयार करना है। कृषि, वन, पीएचई, जल संसाधन, महिला एवं बाल विकास सहित कई विभागों ने मिलकर अभियान को सफल बनाने का दावा किया है। राष्ट्रीय आंकड़ों में डिंडौरी को मध्यप्रदेश में पहला और देश में दूसरा स्थान मिलने की बात कही जा रही है।

लेकिन जमीनी हालात इन दावों से अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। जिले के कई क्षेत्रों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान हैं। ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है, जबकि कई जगहों पर टैंकर और हैंडपंप व्यवस्था भी नाकाफी साबित हो रही है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि लोगों को अपनी समस्या सुनाने के लिए सड़क और हाईवे तक जाम करना पड़ रहा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि जिले में लाखों जल संरचनाएं बनी हैं और जल संरक्षण के इतने बड़े दावे किए जा रहे हैं, तो फिर आम जनता आज भी पानी के लिए आंदोलन क्यों कर रही है? क्या अभियान सिर्फ कागजों और फोटो सेशन तक सीमित है, या फिर जमीनी स्तर पर योजनाओं की निगरानी और उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं?
जल संरक्षण में राष्ट्रीय पहचान हासिल करने वाला डिंडौरी अब इसी सवाल के केंद्र में है कि आखिर उपलब्धियों के दावों और जनता की प्यास के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?




