FIR Order Court : सामाजिक बहिष्कार मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला, बंजारा समाज के चार पदाधिकारियों पर FIR के आदेश..

Rathore Ramshay Mardan
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युवा अधिवक्ता की प्रभावी पैरवी के बाद न्यायालय सख्त, तीन दिन में अपराध दर्ज कर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश

 

छत्तीसगढ़  के कोरबा में सामाजिक बहिष्कार और समाज में पुनः शामिल करने के नाम पर कथित रूप से लाखों रुपये की मांग के मामले में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, कोरबा ने महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए बंजारा समाज के चार वर्तमान एवं पूर्व पदाधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर जांच करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने थाना प्रभारी सिविल लाइन रामपुर की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी करते हुए उनके वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही की बात कही है।

 

मामले में पीड़ित दंपत्ति की ओर से युवा अधिवक्ता प्रिंस अग्रवाल ने प्रभावी पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष आवश्यक दस्तावेज एवं साक्ष्य प्रस्तुत किए। प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने प्रथम दृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए पुलिस को तीन दिनों के भीतर अपराध दर्ज करने का आदेश दिया।

 

प्रकरण के अनुसार जशपुर जिले के एक युवक ने वर्ष 2022 में रायपुर स्थित आर्य समाज मंदिर में सजातीय युवती से विवाह किया था। दोनों अलग-अलग गोत्र से होने के बावजूद समाज के कुछ पदाधिकारियों ने विवाह को अमान्य बताते हुए दंपत्ति एवं उनके परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। इसके चलते दोनों परिवार सामाजिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों से दूर हो गए।

 

परिवाद में आरोप लगाया गया है कि समाज में दोबारा शामिल करने के लिए पहले 11-11 हजार रुपये और बाद में लाखों रुपये की मांग की गई। पीड़ित के अनुसार पहले दो लाख रुपये तथा बाद में अतिरिक्त तीन लाख रुपये की मांग की गई। सामाजिक अपमान और दबाव के चलते उसने अपनी बचत और उधार लेकर एक लाख रुपये से अधिक की राशि भी दी, लेकिन इसके बावजूद उसे समाज में पुनः शामिल नहीं किया गया।

 

वर्ष 2024 में समाज के नए पदाधिकारियों के कार्यभार संभालने के बाद भी पीड़ित ने न्याय की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस स्तर पर भी अपेक्षित कार्रवाई न होने से निराश होकर पीड़ित ने न्यायालय की शरण ली।

 

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि शिकायत मिलने के बावजूद थाना स्तर पर उचित कार्रवाई नहीं की गई। आदेश में कहा गया कि शिकायत की पावती तक नहीं दी गई और न्यायालय के निर्देशों के बाद भी समुचित जांच नहीं की गई, जिससे संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि संबंधित थाना प्रभारी ने एफआईआर दर्ज नहीं कर अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं किया।

 

न्यायालय ने थाना प्रभारी सिविल लाइन रामपुर को निर्देशित किया है कि शेखर बंजारा, महेंद्र बंजारा, नंदकिशोर बंजारा और श्यामलाल बंजारा के विरुद्ध संबंधित धाराओं के तहत तीन दिनों के भीतर एफआईआर दर्ज कर इसकी जानकारी न्यायालय को उपलब्ध कराई जाए। साथ ही निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कर अंतिम प्रतिवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

 

सामाजिक बहिष्कार जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध आया यह फैसला नागरिक अधिकारों की रक्षा और सामाजिक समानता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश ऐसे मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।

 

 

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