नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को अब शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। यह जानकारी भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने लोकसभा में प्रश्न संख्या 1606 पर सांसद लालजी वर्मा के लिखित प्रश्न के उत्तर में दी। मंत्रालय ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के प्रावधानों के अनुसार पद पर बने रहने और पदोन्नति के लिए TET उत्तीर्ण करना जरूरी है। TET पास नहीं करने की स्थिति में शिक्षकों को सेवा से मुक्त किया जा सकता है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि में केवल पांच वर्ष शेष हैं, उन्हें इस नियम से छूट दी जाएगी। इसका अर्थ यह है कि जो शिक्षक वर्ष 2028 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं, उन्हें TET उत्तीर्ण करने की बाध्यता नहीं होगी।

इस फैसले के बाद शासकीय शिक्षक संगठनों में नाराजगी देखने को मिल रही है। शासकीय शिक्षक संगठन के जिला अध्यक्ष राम कुमार गर्ग ने सरकार के निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जनता मोदी सरकार जो ठान लेती है, उसे लागू करके रहती है, लेकिन इस फैसले से मध्यप्रदेश में वर्ष 1995 से 2003 के बीच नियुक्त शिक्षाकर्मी, संविदा कर्मी और गुरुजी का भविष्य संकट में पड़ जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इन शिक्षकों के साथ लंबे समय से भेदभाव होता आ रहा है—न उनकी वरिष्ठता मानी गई, न ही उन्हें किसी विभाग का नियमित कर्मचारी माना गया। राम कुमार गर्ग ने सवाल उठाया कि 1 जुलाई 2018 को जब इन्हें प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षक के पद पर समायोजित किया गया, तो क्या उनकी नियुक्ति तिथि 1 जुलाई 2018 मानी जाएगी या एक बार फिर 1998, 1999, 2001 और 2003 की पुरानी तिथियों को आधार बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले भी अध्यादेश लाकर कई बार सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में बदलाव किया है, ऐसे में क्या वह लाखों शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी ऐसा कदम उठाएगी।
उन्होंने यह भी मांग की कि यदि सरकार TET उत्तीर्ण करने को अनिवार्य करती है, तो सफल शिक्षकों को पुरानी पेंशन योजना और जीपीएफ का लाभ भी दिया जाए। साथ ही उन्होंने पदोन्नति पर लगी रोक का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सरकार ने न्यायालय के माध्यम से शिक्षकों की पदोन्नति रोक दी है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। शासकीय शिक्षक संगठन का कहना है कि जब वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित हुआ था, तब उससे पूर्व की सभी नियुक्तियों को वैध माना जाना चाहिए। संगठन ने सरकार से मांग की है कि वह इस फैसले पर पुनर्विचार करे, ताकि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
सोर्स: लोकसभा | शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
